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Thursday, August 12, 2010

प्राथनाये कभी व्यर्थ नहीं जाती















जलती
है जब अग्नि, तो रौशनी बुझाई नहीं जाती,
बिना मिटटी के तो फसल भी उगाई नहीं जाती!

माना कि हर मंजिल आसान नहीं होती,
हर कोयले के अन्दर छुपी हीरे कि खान नहीं होती!

हर मशाल को रौशनी, करने के लिये जलना ही पड़ता है,
अपनी हस्ती को मिटा कर, दूसरो कि दुनिया उजागर करना ही पड़ता है!

ये ज़िन्दगी एक जंग का मैदान है,
यहाँ हर जीत को हासिल करने के लिये, परिश्रम करना ही पड़ता है!

परिश्रम करने के बाद भी मंजिल कब मिले कुछ कह नहीं सकते,
पर बस इंतज़ार के सहारे भी तो जिंदा रह नहीं सकते!

खुद पर यकीन कर के ही हम चल पड़े है आगे,
हम नहीं वो इंसा जो ,मुश्किलों से भागे,
नहीं इतने कमज़ोर हमारे विश्वास के धागे!

जो सच्ची है मेहनत तो, एक न एक दिन जग में मिल जायेगी ख्याति,
किसी ने ठीक ही कहा है कि, सच्ची प्राथनाये कभी व्यर्थ नहीं जाती !!