Monday, January 3, 2011

सूरज का प्रकाश !




















उगता
हुआ सूरज सभी को बहुत भाता है,
क्यूंकि ये अपने साथ बहुत सा प्रकाश ले कर आता है!

हर इंसान आज उगता हुआ सूरज बनना चाहता है,
इतनी बड़ी दुनिया में अपनी एक पहचान कायम करना चाहता हैं!
ठीक सूरज कि भाँती ही सदा जगमगाना चाहता है!

डूबने
का ख्याल मात्र भी हर इंसान को बहुत सताता है,
इसीलिए शायद डूबता हुआ सूरज किसी को भी नहीं भाता हैं !

उगना
- डूबना, हारना - जीतना, खोना- पाना, आना - जाना,
ये
सभी पात्र हैं मानव जीवन के !

इन सभी के बगैर जीवन नामुमकिन हैं!

जीवन तो एक रंगमंच हैं , ओर लोग हैं कठपुतलियाँ ,
रंगमंच में लोगो ने अपनी मेहनत से क्या क्या नहीं कर लिया!
इस जीवन में सभी को कुछ न कुछ हैं ख़ास मिला है!

जरूरत हैं तो, उस खासियत को पहचानने कि,
पहचान
कर उसे तराशने कि, जाने कब किसी कोयले से हीरा निकल आये!

किसी ने सच ही कहा है कि, उठती हुई लहरों को साहिल कि परवाह नहीं होती,
मजबूत हौसलों के आगे कोई दीवार नहीं होती,

ज़ज्बा
हो तो एक नन्हा दिया भी सूरज कि रौशनी कर दिखाता हैं,
क्यूंकि
उसे जल कर अपने रौशनी का प्रकाश फैलाना बखूबी आता हैं!

Friday, October 22, 2010

विश्वास से भरा एक नन्हा पौधा...........


घना था अँधेरा, जंगल बहुत बड़ा था, 
कहीं किसी कौने में, एक अंकुर फूट रहा था, 

था आँधियों का कहर भी और कई मर्तबा धुप का असर भी कड़ा था, 
फिर भी अपने वजूद को बचाने में, एक अंकुर जी जान से लगा था! 

अंकुर से नन्हे पौधे तक का सफ़र बहुत कठिनाइयों से भरा था, 
किन्तु उस अंकुर के अन्दर आत्मविश्वास गज़ब का भरा था! 

नहीं झुका वो समक्ष आँधियों के,धुप के आगे भी अटल वो खड़ा था, 
क्यूंकि, उस अंकुर के अन्दर मरने के भय से ज्यादा, जीने का उत्साह भरा था!

अपनी एक पहचान बनाने को जंगल में सदियों से वो लड़ा था, 
गुमनामियों में रहते हुए भी मिलेगी पहचान-- हमेशा ही वो इसी आस से आगे बढ़ा था! 

अस्तित्व तो कब का मिट गया होता, उस नन्हे से पौधे का, 
किन्तु जंगल में भी वो अपने, आत्मविश्वास कि शक्ति से अब तलक, 

सभी पौधों के समक्ष अपना वजूद शान से जगमगाए खड़ा था , 
क्यूंकि उस पौधे का विश्वास किसी भी डर से कई- कई गुना बड़ा था!