एक बीज था में, जब मुझको किसी ने बोया था ज़मी में,
चुपचाप किसी कोने में,बस सोया था में नमी में!
सोच रहा था सपनो में ,कैसी होगी मिट्टी से बाहर की वो दुनिया,
इतने में मेरी नींद खुली,और धक्का सा कुछ आया ,
देखा तो बारिश की बूँद को अपने ऊपर मैंने पाया,
कुछ ही पल में वो सिमट गई, और तेज गर्मी ने अपना कहर फिर ढाया,
अभी तो जमी के अन्दर था, तो इतना कुछ हो आया,
क्या होगा बाहर जाकर, ये सौंच के में घबराया !
पर बीज था में अंकुर तो मेरे जीवन का था आना,
ऊपर आया तो जीवन क्या होता है ये मैंने जाना,
एक अंकुर से मैंने खुद को एक पौधे में खुद को ढाला,
कितनी जल्दी हो गया ये सब कुछ -ये जान नहीं में पाया,
कल तक था जो एक बीज ,आज विशाल पेड़ कैसे बन आया !